Tuesday, September 9, 2008



थोडी से उनकी इनायत हो जाय ,


सूनी महफ़िल में रोनक हो जाय,


तोबा हम भी करले शराब से ,


गर उनकी हम पर भी महरबानी हो जाय ,


हम तो है ठहरे सागर की तरह ,


वो जो छुले तो मौजो में रवानी आजाए ,


गुम नाम है इस सहर में हम तो ,


थामले वो हम को तो वेशकीमती हो जाए ,


अँधेरी है कबसे राते मेरी "सागर"


रुखसे उठादे जो वो नकाब तो ये रोशन हो जाए......................

1 comment:

श्रद्धा जैन said...

vinay likhte rahe khyaal bhaut pukhta hai